
बाज़ार में जो पैकेट वाला दूध मिलता है उसी को पाश्चुरीकृत (Pasteurised) दूध कहते है , और पैकेट के उपर साफ साफ लिखा भी दिखायी देता है | परन्तु क्या आप जानते है पाश्चुरीकृत (Pasteurised) दूध कैसे बनाया जाता है| इस के फायदे और नुकसान क्या है और इसका चलन क्यों बढ़ता जा रहा है|
पाश्चुरीकृत (Pasteurised) दूध क्या होता है ?
पाश्चराइजेशन (Pasteurisation) दूध क्या है?
इस प्रक्रिया को इजाद करने का श्रेय फ्रांसीसी केमिस्ट व् माइक्रोबायोलोजीस्ट Louis Pasteur को जाता है, जिनके नाम पर ही इसका नाम पाश्चुरीकरण या पाश्चराइजेशन पड़ा | 20 अप्रैल 1862 में इस प्रक्रिया का प्रथम परीक्षण किया गया था | क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले वर्ष 1886 में जर्मन कृषि रसायनशास्त्री फ्रांज वाँन सॉक्सलेट के मन में दूध को पाश्चुरिकृत करने का ख्याल आया था |
इस तकनीक में दूध को अधिक तापमान में गर्म करने के बाद तेजी से उसको ठंड़ा करके पैक किया जाता है | यह प्रक्रिया दूध को लंबे समय तक सही रखती है | साथ ही यह तकनीक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बैक्टीरिया को भी खत्म करती है | इसे ऐसे कहा जा सकता है कि इस विधि में तरल पदार्थों को गरम करके उसके अन्दर के सूक्ष्मजीवों जैसे जीवाणु, कवक, विषाणु आदि को नष्ट किया जाता है |
1800 के दशक में पाउडर दूध संरक्षण के तरीके के रूप में इजात किया गया था | पाउडर दूध से सभी नमी को हटाकर बनाया जाता है |
पाश्चराइजेशन (Pasteurisation) की खोज कैसे की गई थी?
जैसे की ऊपर बताया गया है कि Louis Pasteur ने इस तकनीक की खोज की थी | वे एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक तथा रसायनशास्त्री थे | इन्हें आधुनिक जीवाणु (Bacteriology) का संस्थापक कहा जाता है | 1860 में उन्होंने एक फ्लास्क में मॉस के टुकड़ों के पोषक घोल को रखकर गर्म किया और फिर ठंडा किया|उन्होंने वायु में रोगाणुओं की अल्पमात्रात्मक वितरण की महत्ता को निर्धारित कर यह सिद्ध किया कि सूक्ष्मजीव (Micro-Organism) वायु में विषम रूप से वितरित रहते है | मूलत: इस तकनीक को वाइन व बियर जैसे मद्य पदार्थो को जल्द खराब होने से बचाने के लिए ईजाद किया गया था| बाद में इसका इस्तेमाल दुग्ध पदार्थो के संरक्षण में भी होने लगा |पाश्चर ने यह पहली बार प्रमाणित किया कि शराब, सिरका और बीयर में किण्वन (Fermentation) खमीर के कारण होता है |
इस विधि में विसंक्रमित पदार्थ को मामूली तापमान पर एक निशिचत समय तक गर्म किया जाता है जिससे हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं और इस पदार्थ के रसायनिक संगठन में कोई परिवर्तन भी नहीं होता है|
क्या आप जानते हैं कि दूध में Streptococcus Pyogenes तथा Mycobacterium Tuberculosis आदि बैक्टीरिया पाए जाते हैं | जिससे टी० बी० जैसी बीमारी का खतरा बना रहता है |

पाश्चराइजेशन (Pasteurisation) कितने तरीकों से किया जाता है?
1. होल्डर विधि (Holder Method)
2. High Temperature and Short Time Method
3. Ultra High Temperature Method
1. होल्डर विधि (Holder Method)
इस विधि में दूध को 144.5°F तापमान पर आधे घंटे के लिए गर्म किया जाता है और फिर तुरंत 50C पर ठंडा कर लिया जाता है| यह छोटे पैमाने पर pathogens को नष्ट करने का तरीका है|
2. High Temperature and Short Time Method
इस विधि में दूध को 161°F तापमान पर 15 सेकंड के लिए गर्म किया जाता है और फिर 40C पर तुरंत ठंडा कर लिया जाता है| हम आपको बता दें कि अधिकतर इस विधि का इस्तेमाल दूध को पाश्चराइज करने के लिए किया जाता है| इस प्रक्रिया से दूध दो से तीन हफ्ते तक सही या फ्रेश रहता है|
3.Ultra High Temperature Method
इस विधि में दूध को 275 °F पर 1 से 2 सेकंड्स के लिए गरम किया जाता है जिससे इसकी लाइफ नौ महीने तक बढ़ जाती है|

पाश्चराइजेशन दूध के फायदे और नुक्सान
पाश्चराइजेशन, दूध में बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है| कच्चे दूध की तुलना में यह दूध की शेल्फ लाइफ को बड़ा देता है|
पाश्चराइज्ड और पाउडर दूध में कच्चे दूध की तुलना में पोषक तत्व कम होते हैं|
पाश्चराइजेशन तकनीक दूध में सभी सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती है, जैसे कि लैक्टिक एसिड बैसिलि, जो कि स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाते हैं|
पेस्टाइजेशन दूध में एमिनो एसिड को बदल देता है; फैटी एसिड को बढ़ा देता है; विटामिन ए, डी, सी और बी 12 को नष्ट कर देता है, खनिज कैल्शियम, क्लोराइड, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, सोडियम और सल्फर, साथ ही कई ट्रेसेसमें खनिजों को भी कम कर देता है|
कुछ synthetic विटामिन को भी पाश्चराइज्ड दूध में मिलाया जाता है क्योंकि दूध के प्राकृतिक एंजाइमों के बिना, उसे पचाना मुश्किल होता है |
